रामनगर : 27 मार्च को उत्तराखंड के राजनीतिक गलियारों में ज़ोरदार चर्चा थी कि BJP के कई पूर्व विधायक और प्रभावशाली निर्दलीय नेता 28 मार्च को कांग्रेस पार्टी में शामिल होने वाले हैं। हर कोई अपने-अपने हिसाब से अंदाज़े लगाने में व्यस्त था। इसमें शामिल नेताओं के नामों पर अटकलें लगाई जा रही थीं और इस कदम से कांग्रेस को होने वाले संभावित फ़ायदों और BJP को होने वाले संभावित नुकसान का विश्लेषण किया जा रहा था। इसी बीच राज्य के सबसे वरिष्ठ नेता हरीश रावत के मन में एक बिल्कुल ही अलग ही बात चल रही थी। 27 मार्च को ही हरीश रावत के सोशल मीडिया हैंडल ‘X’ पर एक पोस्ट दिखाई दी।

28 मार्च को दिल्ली में कांग्रेस द्वारा एक बड़ा शामिल होने का समारोह आयोजित किया गया था, जिसके दौरान कई पूर्व विधायक और प्रमुख नेता औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल हुए। हालाँकि, घटनाओं के इस पूरे क्रम के बीच, एक नाम सबसे ज़्यादा अटकलों का विषय बना रहा: संजय नेगी। ख़बरों के मुताबिक, उनका पार्टी में शामिल होना आखिरी समय पर नहीं हो पाया, जिससे राजनीतिक गलियारों में अफ़वाहों और चर्चाओं का दौर तेज़ हो गया। सूत्रों के अनुसार, इस फ़ैसले के पीछे मुख्य वजह यह थी कि पार्टी के भीतर इस पर आम सहमति नहीं बन पाई थी। इन घटनाक्रमों के बाद, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की नाराज़गी भी खुलकर सामने आ गई है। बताया जा रहा है कि उन्होंने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और इसके परिणामस्वरूप, 15 दिनों की ‘राजनीतिक छुट्टी’ (political sabbatical) पर जाने का फ़ैसला किया। हालाँकि इस दौरान वे सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहे, लेकिन उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों से दूरी बनाए रखी। राजनीतिक विश्लेषक इसे एक महत्वपूर्ण संकेत मान रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मोड़ पर कांग्रेस पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकता बनाए रखना है। यदि पार्टी के भीतर गुटबाज़ी और आंतरिक मतभेद इसी तरह जारी रहे, तो आने वाले चुनावों में कांग्रेस को बढ़ती मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इसके विपरीत, यदि पार्टी इन मतभेदों को सुलझाने में सफल हो जाती है, तो इसका राज्य के राजनीतिक परिदृश्य पर सीधा असर पड़ेगा। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का यह भी कहना है कि कांग्रेस पार्टी की आंतरिक कलह से सबसे ज़्यादा फ़ायदा भारतीय जनता पार्टी को होने की संभावना है। यदि कांग्रेस एकजुट होने में विफल रहती है, तो विपक्ष के रूप में उसकी भूमिका कमज़ोर पड़ सकती है, जिससे सत्ता में वापसी का उसका सपना और भी दूर हो सकता है। फ़िलहाल, उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर चल रही राजनीतिक उथल-पुथल आने वाले दिनों में और तेज़ होने की संभावना है। अब सभी की नज़रें कांग्रेस आलाकमान पर टिकी हैं कि वह इस आंतरिक विवाद को कैसे सुलझाता है और पार्टी को एकजुट रखने में किस हद तक सफल होता है।

