दिल्ली : पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का निधन ऐसे समय में हुआ है जब ईमानदारी और राजनीतिक साहस के उदाहरण कम ही सुनने को मिलते हैं। लेकिन उनका आखिरी सार्वजनिक संदेश, जो अब वायरल हो गया है, किसी व्यक्ति की बीमारी या मृत्यु की सूचना मात्र नहीं था, बल्कि वह पत्र एक सच्चे जनप्रतिनिधि का आखिरी घोषणापत्र था। अपने अंतिम दिनों में राम मनोहर लोहिया अस्पताल के आईसीयू से सत्यपाल मलिक द्वारा लिखे गए इस संदेश में, मलिक ने न केवल अपने बिगड़ते स्वास्थ्य की जानकारी साझा की, बल्कि सत्ता के गलियारों में छिपी उन कड़वी सच्चाइयों को भी उजागर किया, जिनसे ज़्यादातर लोग डरते हैं और चुप रहते हैं।
उन्होंने खुलासा किया कि जब वे राज्यपाल थे, तो उन्हें 150-150 करोड़ रुपये की रिश्वत की पेशकश की गई थी, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। यह बयान उस राजनीतिक ईमानदारी की पुष्टि करता है, जो आज बहुत कम नेताओं में देखने को मिलती है। सत्यपाल मलिक का यह पत्र आत्म-मूल्यांकन नहीं, बल्कि व्यवस्था, सरकार और उन संस्थाओं पर एक कठोर आरोप है जो सच्चाई को सामने लाने के बजाय उसे कुचलने की कोशिश करते हैं। पुलवामा हमले से जुड़ी उनकी लगातार मांगों और पहलवानों के आंदोलन को उनके समर्थन पर सरकार की चुप्पी ने उन्हें सत्ता का निशाना बनाया। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कभी झुकने या डरने की बात नहीं की।
सत्यपाल मलिक का यह बयान कि वह एक कमरे के घर में रहते हैं और कर्ज में डूबे हैं, हमारी राजनीति के उस दुर्लभ चेहरे को सामने लाता है, जहाँ एक व्यक्ति सत्ता का इस्तेमाल अपनी सुविधा के लिए नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ बनने के लिए करता है। आज के दौर में, जहाँ ज़्यादातर नेता करोड़ों-अरबों की संपत्ति के मालिक हैं, एक पूर्व राज्यपाल का सरकारी अस्पताल में इलाज और निजी अस्पताल न जा पाने की लाचारी एक गहरी पीड़ा और विडंबना को जन्म देती है।
सवाल उठता है कि क्या एक ईमानदार व्यक्ति को व्यवस्था से टकराने की इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी? क्या सार्वजनिक जीवन में सच बोलना अब आत्मघाती कदम बनता जा रहा है? सरकार और एजेंसियों को मलिक के इस आखिरी सार्वजनिक पत्र का गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए। न केवल उन पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जिन नेताओं ने अपना जीवन जनसेवा में समर्पित कर दिया है, उनका सम्मान और सुरक्षा भविष्य में भी बनी रहे।
सत्यपाल मलिक ने अपने अंतिम शब्दों में जिस आत्मसम्मान और निष्ठा का परिचय दिया, वह हमारे लोकतंत्र के लिए हृदयस्पर्शी है। यह किसी नेता का अंतिम वक्तव्य मात्र नहीं, बल्कि उस युग का अंतिम आह्वान है जहाँ सत्य को सुना और समझा जाना चाहिए, दबाया नहीं जाना चाहिए।
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