सहारनपुर : एक ओर जहां दहेज़ के लालची लोगों ने बेटे की शादी ज्यादा से ज्यादा दहेज़ को फैशन बना लिया है वहीं कैराना से पूर्व बीजेपी सांसद प्रदीप चौधरी ने बेटे की शादी में दहेज़ की मोती रकम वापस कर अनोखी मिशाल पेश की है। सांसद प्रदीप चौधरी ने बड़े बेटे अंशुमन चौधरी के रोका मिले पैसों से भरे बैग को वापस लौटा कर केवल एक रुपया शगुन के रूप में लेकर शादी की सौदेबाजी करने वालों को करारा जवाब दिया है। जिसकी सराहना पुरे जिले में हो रही है। सांसद प्रदीप चौधरी दहेज़ रहित शादी करने को लेकर गुर्जर समाज ने सराहनीय कदम बताया है और सर्व समाज को सीख लेने की अपील की है। हालांकि लाल रंग के भारी भरकम बड़े बैग में कितने रूपये थे इसका खुलासा नहीं किया है। लेकिन एक रुपया और नारियल शगुन में लेने की चर्चा सभी मेहमान कर रहे हैं।

आपको बता दें कि कैराना लोकसभा सीट से सांसद रहे प्रदीप चौधरी के बड़े बेटे अंशुमन चौधरी का रिश्ता शामली निवासी चौधरी इंद्रपाल सिंह की बेटी सोनम चौहान के साथ हुआ था। बुधवार को अंशुमन के मंढे की रस्म चल रही थी बड़ी संख्या में VVIP मेहमानों के साथ रिश्तेदारों और अन्य मेहमान भी आये हुए। मंढे के मौके पर ही चौधरी इंद्रपाल रोका करने पहुंचे थे। मेहमान विभिन्न व्यजनों का आनंद ले रहे थे। सांसद प्रदीप चौधरी समेत परिजन मेहमानों की आव भगत में लगे हुए थे। दोपहर को प्रदीप चौधरी के बेटे अंशुमन का रोका की रस्म हुई तो एक सब भौचक्के रह गए।
तिलक के बाद जब चौधरी इंद्रपाल सिंह ने बतौर दहेज़ नोटों से भरा लाल रंग का बैग दिया तो पूर्व सांसद प्रदीप चौधरी ने यह कह कर वापस लौटा दिया कि उनके लिए दुल्हन ही दहेज़ है। हालाँकि शगुन के रूप में एक रुपया और नारियल लेकर रोका की रस्म को पूरा किया। सांसद प्रदीप चौधरी के नारों से भरा बैग वापस करने पर पूरा पांडाल तालियों से गूंज उठा। वहीं बेटे अंशुमन ने भी नोटों से भरा बैग लेने से मना कर दिया। अंशुमन का कहना है कि जो पिता अपनी बेटे को मेरे हाथों में सौंप रहे हैं मेरे लिए उससे बड़ा कोई दहेज़ नहीं नहीं। रिश्ता लेनदेन से नहीं बल्कि प्यार और मेलजोल से बनते हैं।
वहीं गुर्जर समाज के लोगों का कहना है कि पूर्व सांसद प्रदीप चौधरी ने अपने बेटे की शादी को आडंबर नहीं बल्कि आदर्श का उत्सव बनाया। जिस समाज में विवाह को दहेज की रकम से तौला जाता है, वहाँ उन्होंने एक रुपया लेकर बिना दहेज के बेटे विवाह कर यह सिद्ध किया कि रिश्तों की कीमत नोटों की गड्डियों से नहीं आँकी जाती। 18 फरवरी को सगाई के अवसर पर जब नोटों से भरी अटैची लौटाई गई तो वह केवल एक वस्तु की वापसी नहीं थी। वह उस सोच का प्रत्याख्यान था जो बेटी को बोझ और विवाह को सौदे में बदल देती है।
यह कदम किसी भाषण से अधिक प्रभावशाली था। बिना मंच, बिना माइक, उन्होंने कर्म से साहित्य रचा। उनका यह आचरण समाज के लिए एक आईना है। जिसमें हम अपनी परंपराओं को नए प्रश्नों के साथ देख सकते हैं। प्रदीप चौधरी ने यह संदेश दिया कि बदलाव शोर से नहीं बल्कि उदाहरण से आता है। और जब नेतृत्व संवेदना से जुड़ता है तब समाज स्वयं आगे बढ़ने लगता है। यह विवाह एक परिवार का निजी निर्णय भर नहीं रहा। यह एक नजीर बन गया। आने वाली पीढ़ियों के लिए यह कथा कहेगी कि सम्मान, सादगी और समानता ही किसी भी रिश्ते की सच्ची पूँजी हैं।