600 सालों से नशामुक्ति की अलख जगाए हुए सहारनपुर का यह गाँव, 36 तामसिक चीजों पुरे गाँव में कोई नहीं करता सेवन, गिनीज बुक में दर्ज हो चुका गांव का नाम 

Saharanpur News

सहारनपुर : एक ओर जहां बिहार विधानसभा चुनाव में शराबबंदी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ वहीं सहारनपुर का एक गाँव 600 सालों से न सिर्फ नशीली चींजों से कोसो दूर है बल्कि नशामुक्ति की अलख जगाये हुए है। इस गांव में शराब मांस मदिरा तो दूर लहसुन-प्याज जैसी करीब 36 तामसिक चींजो का सेवन नहीं किया जाता। ख़ास बात ये है कि नशामुक्ति के लिए इस गांव को किसी सरकारी आदेश की ज़रूरत नहीं बल्कि लोग इस सदियों पुरानी परंपरा का खुद ही पालन करते आ रहे हैं। यहाँ कोई तंबाकू नहीं खाता, न ही शराब पीता है। किसी भी दुकान पर गुटखा या बीड़ी तो लहसुन प्याज जैसे तामसिक मसाले भी नहीं बिकते। मिरगपुर नाम का यह गाँव पीढ़ी दर पीढ़ी यानी 20 पीढ़ियों से नशे की लत को दूर रखे हुए है। इसके लिए सरकार ने मिरगपुर गांव को नशा मुक्त गांव का सर्टिफिकेट भी दिया है। इतना ही नहीं गांव का नाम गिनीज बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में भी दर्ज किया जा चुका है।

Saharanpur Drugs Free Village

एक ओर जहां आज दौर में युवा पीढ़ी बीड़ी-सिगरेट, पान-तम्बाकू और मांस मदिरा को फैशन बना चुके हैं। वही सहारनपुर का मिरगपुर गांव आधुनिकता से परे एक गज़ब की इबारत लिख रहा है। आधुनिकता अभी इस गांव को छू भी नहीं पाई है। यहां के युवा न तो अपनी जवानी को धुंए में उड़ाते हैं और न ही अपनी ज़िन्दगी में शराब को स्थान देते हैं। गांव के ग्रामीण नशीले पदार्थो पर पूर्ण रूप से प्रतिबंद लगा कर आज की युवा पीढ़ी के जीवन को संवारने में जुटे है। हमने गाँव की दूकान जाकर सिगरेट मांगी तो दुकानदार राजकरण का दो टूक कहना था कि लगता है आप हमारे गांव में पहली बार आये हो। हमारे यहां किसी भी दूकान पर बीड़ी सिगरेट और तंबाकू तो दूर लहसुन प्याज भी नहीं मिलता। गाँव में करीब 50 दुकाने हैं लेकिन किसी भी दूकान पर तामसिक चीजें नहीं मिलेंगी। उनके गाँव में नशीली चीजों का सेवन और खरीद फरोख्त पूर्णत बंद है।

इसके बाद हमने 85 साल के बुजुर्ग राजपाल से मुलाक़ात की और नशा मुक्त गांव के बारे में बातचीत की। बुजुर्ग राजपाल ने बताया कि उनके गाँव में 600 साल पहले बाबा फकीरा दास आये थे। उस वक्त गाँव में एक ही हिन्दू परिवार रहता था जिसमें पांच भाई हुआ करते थे। बाबा फकीरा दास ने गाँव को नशामुक्त रहने का वरदान दिया तो मुस्लिम समुदाय के लोग गाँव छोड़ कर दूसरे गाँवों में जाकर बस गए। आज इस गाँव में की आबादी 10000 से ज्यादा हो गई। आधुनिक युग में भी गाँव का युवा हाईटेक सिटी में जाने के बाद भी किसी तरह का नशा नहीं करता। वहीं ग्रामीण करीब 600 सालों से चली आ रही अनोखी परम्परा को पीढ़ी दर पीढ़ी कायम रखे हुए है। शायद ही कोई ऐसा गांव होगा जहाँ लोग नशीले पदार्थो जैसे- बीड़ी, सिगरेट, गुटखा, पान, शराब आदि का सेवन नहीं करते हो लेकिन मिरगपुर गांव के ग्रामीण नशा और अंडा मांस मदिरा तो दूर लहसुन – प्याज से भी गुरेज करते है। ख़ास बात तो ये भी है कि पूरे गाँव में दुकानो पर भी नशीले पदार्थ बेचने पर प्रतिबंध है। इतना ही नहीं चौपालो में अकसर गुड़गुड़ाये जाने वाले हुक्के से परहेज कर ग्रामीण आस पास के ग्रामीणो को भी नशीले पदार्थो का सेवन नहीं करने की हिदायत देते है।

Saharanpur Drugs Free Village

कहते हैं ” जैसा देश वैसा भेष ” की तरह बड़े बुजुर्ग मिरगपुर के बच्चे – बच्चे पर अपने गांव की इस अनोखी परम्परा का रंग चढ़ा हुआ है। जहाँ पूरे गांव में दुकानो पर नशे की चीजो पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा है और गांव का हर आदमी इन सभी चीजो से परहेज कर रहा है। वहीँ होश सँभालते ही परम्परा को कायम रखने में लगे नई पीढ़ी के युवा भी अपने बुजुर्गो के नियमो को बरक़रार रखने की बात कर रहे है। सहारनपुर जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर बसे गांव मिरगपुर की कुछ ऐसी की कहानी है।.जहां गांव के लोगों ने 6 सदियों से किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ और तामसिक चीजों का सेवन नहीं किया हैं। जिसके चलते वर्षो पुरानी अनोखी परम्परा को कायम रख  के ग्रामीणों ने एकता की मिशाल कायम की है।

बड़े बुजुर्ग लगातार 20 से ज्यादा पीढ़ियां लगातार नशीली तामसिक चींजों से दूर हैं। गाँव में हमें 100 साल की अम्मा राजकली मिली जिसने बताया कि उसकी शादी 75 साल पहले हुई थी। 75 साल पहले उन्होंने अपने गाँव दाबकी में ही लहसुन प्याज खाया था। लेकिन शादी के बाद आज तक लहसुन प्याज को छुआ तक नहीं। अगर वे अब मायके भी जाती है तो उनके लिए बिना लहसुन प्याज का खाना बनता है। गाँव की दूसरी महिला पाली ने बताया कि उनके यहां बिना लहसुन प्याज के ही स्वादिष्ट सब्जियां बनती हैं। शताब्दियों से गांव में नशीले पदार्थो पर पूर्ण रूप से प्रतिबंद लगा कर आज की युवा पीढ़ी के जीवन को संवारने में जुटे है। साथ ही पूरे गाँव में दुकानो पर भी नशीले पदार्थ बेचने पर भी प्रतिबंद लगाया है। इतना ही नहीं चौपालो में अकसर गुड़गुड़ाये जाने वाले हुक्के से परहेज कर ग्रामीण आस पास के ग्रामीणो को भी नशीले पदार्थो का सेवन नहीं करने की हिदायत दे रहे हैं।

Saharanpur Drugs Free Village

आपको बता दें कि इकट्ठा होकर बैठे लोगो की ये कोई पंचायत नहीं है बल्कि खाली समय गुजारने के लिए ग्रामीणो की चौपाल लगी है। यह चौपाल है उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के पूर्णत नशा मुक्त गांव मिरगपुर के ग्रामीणो की है। जहाँ के लोग खाली समय बिताने के लिए हुक्का नहीं गुड़गुड़ाते बल्कि गीत भजन गाकर समय बिताते है साथ ही एक दूसरे से सुख दुःख की बात कर हिम्मत भी बढ़ाते है। हुक्का गुड़गुड़ाये तो इन्हे शद्धियां बीत चुकी है। मिरगपुर गाँव के लोग पिछले 600 सालो से चली आ रही अनोखी परम्परा को पीढ़ी दर पीढ़ी कायम रखे हुए है। शायद ही कोई ऐसा गांव होगा जहाँ लोग नशीले पदार्थो जैसे – बीड़ी, सिगरेट , गुटखा , पान , तम्बाकू , शराब और मांस मीट आदि से परहेज करते हो लेकिन मिरगपुर गांव बीड़ी सिगरेट , पान -तम्बाकू और मांस मदिरा तो दूर लहसुन – प्याज जैसी तामसिक चीजों का भी परहेज करता आ रहा है।

ग्रामीणो ने लगातार 6 सदियों से इन सभी नशीली चीजो पर गांव में प्रतिबंद लगा कर अनोखी मशाल कायम की है। बताया जाता है कि ये प्रतिबंद गांव में 600 वर्ष पहले आये बाबा फकीरा दास की प्रेरणा का परिणाम है। ग्रामीण एक ओर जहाँ नशीले पदार्थो से खुद परहेज करते है वहीँ आने वाले मेहमानो को भी नशा न करने की हिदायत देते है। साथ ही नशीले पदार्थो के प्रतिबंध को गांव की खुशहाली का राज बताते है। सहारनपुर से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित मिरगपुर अपने आप में एक मिसाल है। यहाँ के निवासी न सिर्फ़ नशे से दूर रहते हैं, बल्कि दूसरों को भी इससे दूर रहने की शिक्षा देते हैं। गाँव में किसी भी तरह के नशीले पदार्थ की बिक्री पूरी तरह से प्रतिबंधित है। नशा मुक्ति का संकल्प पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है।

Saharanpur Drugs Free Village

सहारनपुर के ब्लॉक और तहसील देवबंद का गांव मिरगपुर पवित्र गाँव यु ही नहीं माना जाता। इसके लिए यहां के ग्रामीणों ने 600 साल से ज्यादा की उस परंपरा को कायम किया हुआ है। जिसके चलते यह गाँव पूरी तरह विकसित हुआ है। 10 हजार की आबादी वाला यह गाँव पूरी तरह शिक्षित है। ग्रामीणों का मुख्य पेशा कृषि है यहां बड़े स्तर पर किसानी की जाती है। गन्ने की फसल मुख्य फसल है। बावजूद इसके गाँव के युवाओं का रुझान शिक्षा की ओर रहता है। ग्रामीणों के मुताबिक़ गाँव में से 20 से ज्यादा युवा पुलिस और आर्मी में अपनी सेवा दे रहे हैं। जबकि ज्यादातर युवक युवतियां शिक्षा के क्षेत्र में सेवा दे रहे हैं। कुछ युवक खेतीबाड़ी के साथ प्राइवेट नौकरियां भी कर रहे हैं। 100 से ज्यादा युवक दिल्ली, नॉएडा, गुरुग्राम और चंडीगढ़ जैसे शहरों में अच्छे पे स्केल पर प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं। ख़ास बात तो ये है कि गाँव की एक लड़की ने PCS भी किया है।

आधुनिक युग में देश का युवा नशे में अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहा है लेकिन नशा मुक्त गाँव मिरगपुर के युवा खाली समय में खेल कूदकर अपनी सेहत बना रहे हैं। इसके लिए गाँवों में ही बॉलीबॉल मैदान के तैयार किया हुआ है। दिन निकलते ही युवाओं की टोली सड़कों पर दौड़ लगाने निकल पड़ती है। गाँवों में हाईस्कूल सरकारी स्कूल है जबकि एक संस्थागत इंटर कॉलेज चल रहा है। नशा मुक्त गाँवों में एक सरकारी अस्पताल भी है जहां मिरगपुर गाँव से बहुत कम मरीज आते हैं। मुताबिक़ गाँव में तामसिक चींजो के प्रतिबंध से शरीर स्वस्थ रहता है। जिसके चलते उन्हें अस्पताल जाने की जरूरत नहीं पड़ती।

Saharanpur Drugs Free Village

आपको बता दें कि करीब 600 साल पहले गांव मिरगपुर में बाबा फकीरा दास रुके थे। उस वट मुग़ल शासन चल रहा था। यही वजह है कि बाबा को किसी ने खाने के लिए कुछ नहीं दिया था। जिसके बाद बाबा फकीरा दास ने बिन ब्यायी भैंस का दूध निकाल कर खीर बनाकर प्रसाद बांटा और खुद खाई थी। बाबा के इस चमत्कार को देख हिन्दू परिवार उनके मुरीद हो गए। जिसके बाद बाबा ने उन्हें तामसिक चींजो और नशे से दूर रहने के साथ खुशहाल रहने का मन्त्र दिया। बाबा फकीरा दास को अपना आराध्य मानते हुए हिन्दू परिवारों ने उनके आदेश का पालन करते हुए नशा और तामसिक चींजो से परहेज करना शुरू कर दिया। उसके बाद गाँव के बाहर बाबा फकीरादास का भव्य मंदिर बनाया गया। जहां आसपास के गाँवों के लोग भी दर्शन करने आते है। ग्रामीणों ने बताया कि बाबा फकीरा दास के मंदिर पर साल में दो बार विशाल मेला आयोजित किया जाता है। गाँव के हर घर में पकवान बनाये जाते हैं।

ग्राम प्रधान विक्रम सिंह ने बताया कि यहां की चौपाल में हुक्का नहीं गुड़गुड़ाया जाता बल्कि लोग रागनी और बाबा के भजन गाकर खाली समय बिताते हैं। पिछले 15 सालों से किसी भी ग्रामीण के खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। गाँवों के मौजिज लोग आपस में बैठकर आपसी झगड़ों को निपटा लेते हैं। वहीं गाँव में दशकों पहले किसी ने नियम तोड़ने की कोशिश की थी जिस पर जुर्माना लगाया गया था लेकिन उसके माफ़ी मांगने और भविष्य में नियम ना तोड़ने की कसम खाई तो उसे माफ़ कर दिया था।

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