जगदीप धनखड़ : जगदीप धनखड़ का उपराष्ट्रपति पद से अचानक इस्तीफा न केवल संवैधानिक राजनीति की एक बड़ी घटना है, बल्कि इसके पीछे छिपी जातिगत राजनीति, सत्ता संघर्ष और सामाजिक विश्वासघात की परतें अब धीरे-धीरे खुल रही हैं। दरअसल, धनखड़ का इस्तीफा उन कारणों से नहीं हुआ जो सार्वजनिक रूप से बताए जा रहे हैं। यह केवल “व्यक्तिगत कारणों” या “स्वास्थ्य कारणों” की कहानी नहीं है, बल्कि एक गहरे सत्ता संघर्ष की पटकथा है, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और धनखड़ जैसे किरदारों ने अपनी-अपनी भूमिका निभाई है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि संघ, जो 75 साल की उम्र के बाद मोदी को रिटायर करने की तैयारी में था, धनखड़ से इस्तीफा दिलवाकर और यह संदेश देकर कि “जब तक संघ चाहेगा, वे यहीं हैं” कहकर उसे हाशिये पर धकेल दिया गया। राजनीति में “चाटुकारिता” के बादशाह के रूप में अपनी पहचान बना चुके जगदीप धनखड़ को बलि का बकरा इसलिए बनाया गया क्योंकि सत्ता में वफ़ादारी की कोई गारंटी नहीं होती, और जो दिखता है वो अक्सर अस्थायी होता है। इसलिए धनखड़ को बलि का बकरा और राजनीतिक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया है।
पिछले एक दशक में जिस तरह से जाट समुदाय ने बार-बार भाजपा का समर्थन किया, उसके बदले में उसे क्या मिला? दिल्ली में प्रवेश वर्मा को मुख्यमंत्री बनाने के नाम पर जाट समुदाय से समर्थन लिया गया, लेकिन क्या उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया? 2013 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जाट वोट हथियाने के लिए मुजफ्फरनगर दंगों को जाट बनाम मुसलमान का मुद्दा बना दिया। उस दंगे में गिरफ्तार हुए युवाओं की जिंदगियां आज भी उस तबाही की गवाही देती हैं। जिन जाट पहलवान बेटियों के साथ कभी प्रधानमंत्री फोटो खिंचवाने को आतुर रहते थे, उन्हें महिला पहलवान आंदोलन के दौरान दिल्ली पुलिस ने बूटों से कुचला और भाजपा सांसद ने अपमानित किया।
जाट समुदाय का बार-बार इस्तेमाल किया गया है, वादों, तस्वीरों, जातीय भावनाओं और नारों के साथ। लेकिन जब भागीदारी की बात आई, तो उन्हें हाशिये पर धकेल दिया गया। आज समाज सत्ता के कुचक्रों में उलझा हुआ है, यह समझना ज़रूरी है कि निजी लाभ की रणनीति को समाज की नीति नहीं कहा जा सकता। जब तक समाज, ख़ासकर जाट समुदाय, यह नहीं समझेगा कि उसका ऐतिहासिक “उदार ज़मींदार” स्वभाव और उसका “सामंती सत्ता-आधारित” दृष्टिकोण मूलतः विरोधी है, तब तक उसका सिर्फ़ भावनात्मक इस्तेमाल होता रहेगा। दरअसल, धनखड़ जैसे लोग, जो न तो जाट राजनीति की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, न ही उसके स्वाभिमान का! वे सत्ता के संतुलन में सिर्फ़ एक मोहरा थे। और अब जब उनका काम तमाम हो गया है, तो उन्हें भी दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंका गया है।
बहरहाल, मेरा मानना है कि यह इस्तीफ़ा नहीं, बल्कि समाज के लिए एक संदेश है। धनखड़ का इस्तीफ़ा न तो किसी गलत आचरण का नतीजा है, न ही किसी निजी कारण का! यह एक राजनीतिक संदेश है, जो सरकार की कठोरता, उसकी अवसरवादिता और अंततः वफ़ादारों की उपेक्षा को उजागर करता है। हमेशा साथ देने वाले अब सवाल उठा रहे हैं और ये सवाल उठाना ज़रूरी भी है। जब तक समाज अपने इतिहास और वर्तमान को नहीं समझेगा, तब तक वह सरकार की कठपुतली ही बना रहेगा। इसलिए, यह समय जागरूक होने का है, आपस में टकराने का नहीं! लेकिन अपने भीतर झाँकने और खुद से सवाल करने का ज़रूर है।

