सहारनपुर : दिल्ली की शाही जामा मस्जिद में आयोजित रोज़ा इफ्तार पार्टी इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। इस इफ्तार पार्टी में केवल वीवीआईपी लोगों की मौजूदगी और मस्जिद जैसे मुक़द्दस मक़ाम का इस अंदाज़ में इस्तेमाल लोगों के बीच कई सवाल खड़े कर रहा है। आम लोग इस पर तरह-तरह की राय ज़ाहिर कर रहे हैं। शाही इफ्तार पार्टी पर देवबंदी उलेमाओं ने प्रतिक्रिया दी है।
जमीयत दावातुल मुस्लिमीन के संरक्षक और मशहूर देवबंदी आलिम, मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने सख़्त टिप्पणी करते हुए कहा कि बहुत से लोग उनसे इस मसले पर राय मांग रहे हैं, इसलिए उनका रुख़ बिल्कुल वाज़ेह है। मौलाना ने कहा कि “हमारी बात बिल्कुल साफ़ है कि मस्जिद अल्लाह का घर है। यह तरबियत, इबादत, इंसाफ़ और बराबरी की जगह है। मस्जिद के माहौल में लोगों को दर्जों और केटेगरी में बाँटना सरासर ग़लत है।
रोज़ा इफ्तार कराना बेशक बहुत बड़ा सवाब का काम है, लेकिन यह भी याद रखा जाना चाहिए कि इफ्तार का सबसे पहला हक़ ग़रीबों, मिस्कीनों और ज़रूरतमंद रोज़ेदारों का है। अगर मस्जिदों में इफ्तार का निज़ाम भी रसूख़, शोहरत और खास लोगों तक सीमित हो जाए, तो यह मस्जिद की रूह और रमज़ान के पैग़ाम दोनों के ख़िलाफ़ है।”
उन्होंने आगे कहा कि रमज़ान हमदर्दी, मुसावात और इंसानी बराबरी का महीना है। ऐसे में मस्जिदों को आम मुसलमानों, खास तौर पर ग़रीब और ज़रूरतमंद तबक़े के लिए खुला और अपनापन देने वाला मरकज़ बने रहना चाहिए, न कि केवल रस्मी या वीआईपी जमावड़ों का मंच।

