जस्टिस अमित महाजन की पीठ ने यह टिप्पणी भारतीय वायु सेना के एयर हेडक्वार्टर स्थित डायरेक्टोरेट ऑफ पर्सनल सर्विसेज के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (CPIO) की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिका में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के जुलाई 2020 के आदेश को चुनौती दी गई थी। आयोग ने संबंधित अधिकारी को ‘स्पेशल फ्लाइट रिटर्न्स’ रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था।
मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की यात्राओं का मांगा था विवरण
यह मामला सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश के. बत्रा की ओर से दायर RTI आवेदन से जुड़ा है। उन्होंने 1 अप्रैल 2013 से 5 जून 2018 के बीच पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय वायु सेना के विमानों से हुई विदेश यात्राओं के संबंध में जानकारी मांगी थी।
आवेदन में इन यात्राओं से जुड़े ‘स्पेशल फ्लाइट रिटर्न्स’ रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया था। भारतीय वायु सेना ने सूचना का अधिकार कानून की धारा 8(1)(ए) और 8(1)(ई) के तहत छूट का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया था।
इसके बाद मामला केंद्रीय सूचना आयोग तक पहुंचा। आयोग ने जुलाई 2020 में रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का निर्देश दिया, जिसे वायु सेना के संबंधित केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।
रिकॉर्ड में कई संवेदनशील जानकारियां होने की दलील
सुनवाई के दौरान भारतीय वायु सेना की ओर से कहा गया कि ‘स्पेशल फ्लाइट रिटर्न्स’ में कई प्रकार की संवेदनशील जानकारियां दर्ज होती हैं। इनमें यात्रियों का विवरण, विमान और चालक दल से जुड़ी जानकारी, उड़ान के संदर्भ, यात्रियों की संख्या, संबंधित एजेंसियों का विवरण और प्रधानमंत्री की सुरक्षा में तैनात कर्मियों से संबंधित जानकारियां शामिल हो सकती हैं।
वायु सेना ने तर्क दिया कि इन विवरणों को सार्वजनिक करने से प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था के कुछ पहलुओं का पता लगाया जा सकता है। भले ही सुरक्षाकर्मियों के नाम और पहचान हटा दिए जाएं, लेकिन रिकॉर्ड में मौजूद अन्य जानकारियों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचनाओं के साथ जोड़कर महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
ऐसे विवरणों से सुरक्षा तैनाती के तरीकों और व्यवस्था से जुड़े पहलुओं का खुलासा होने की आशंका जताई गई। वायु सेना के मुताबिक, इससे प्रधानमंत्री की सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
नाम हटाने से खत्म नहीं होगा सुरक्षा जोखिम
हाईकोर्ट ने इस तर्क पर विचार करते हुए कहा कि सुरक्षा कर्मियों के नाम या पहचान हटाना अपने आप में पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं है। रिकॉर्ड में मौजूद अन्य विवरणों से भी संवेदनशील जानकारियां सामने आ सकती हैं। इसलिए केवल कुछ सूचनाओं को हटाकर बाकी रिकॉर्ड सार्वजनिक करने से संभावित खतरे पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे।
अदालत ने प्रधानमंत्री के जीवन और शारीरिक सुरक्षा से जुड़े जोखिम को भी महत्वपूर्ण माना। मामले में मुख्य सवाल यह था कि क्या मांगी गई जानकारी को सार्वजनिक करने से ऐसे विवरण उजागर हो सकते हैं, जिनका इस्तेमाल सुरक्षा व्यवस्था को समझने या प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है।
हाईकोर्ट का रुख इस बात पर केंद्रित रहा कि सूचना तक पहुंच के अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी की गोपनीयता के बीच संतुलन जरूरी है।
RTI और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन
सूचना का अधिकार कानून नागरिकों को सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम देता है। हालांकि, कानून में राष्ट्रीय सुरक्षा और कुछ अन्य संवेदनशील सूचनाओं के लिए छूट के प्रावधान भी हैं।
इस मामले में भारतीय वायु सेना ने इन्हीं प्रावधानों का हवाला देकर रिकॉर्ड साझा करने से इनकार किया था। हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती केंद्रीय सूचना आयोग के उस आदेश को लेकर थी, जिसमें प्रमाणित प्रतियां देने का निर्देश दिया गया था।
अदालत की टिप्पणियों का मुख्य आधार यह था कि किसी रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने से पहले उसके संभावित प्रभावों का आकलन जरूरी है। खासकर जब मामला प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं, विमान और सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित हो, तो केवल व्यक्तिगत पहचान हटाना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
इस तरह मामला सरकारी रिकॉर्ड की पारदर्शिता और संवेदनशील सुरक्षा सूचनाओं की गोपनीयता के बीच संतुलन से जुड़ा है। अदालत ने माना कि संबंधित विवरणों के सार्वजनिक होने से राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर जोखिम पैदा हो सकता है।

