सावन स्पेशल : सहारनपुर का 500 साल पुराना भूतेश्वर महादेव मंदिर, जहां मराठा काल की विरासत में बसती है भोलेनाथ की भक्ति

मराठा काल की विरासत में बसती है भोलेनाथ की भक्ति

सहारनपुर : सावन का महीना शुरू होते ही पूरा उत्तर भारत भगवान शिव की भक्ति में डूब जाता है। हर तरफ हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयकारे सुनाई देते हैं। कहीं कांवड़िये हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने गंतव्य की ओर बढ़ते नजर आते हैं, तो कहीं शिवालयों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं। सावन के पहले सोमवार को भी सहारनपुर के मंदिरों में ऐसा ही भक्तिमय माहौल देखने को मिला। लेकिन इन सबके बीच सहारनपुर का ऐतिहासिक भूतेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धा, आस्था और इतिहास का अनूठा संगम बनकर सामने आया। सावन के पहले सोमवार को मराठा कालीन भूतेश्वर महादेव मंदिर में सुबह से ही शिवभक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। हाथों में पूजा की थाली, लोटे में गंगाजल और जुबां पर भोलेनाथ का नाम लिए श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। भक्तों ने भगवान शिव के स्वयंभू माने जाने वाले शिवलिंग पर जलाभिषेक किया और बेलपत्र, दूध और पुष्प अर्पित कर अपनी मनोकामनाएं मांगीं। मंदिर परिसर में हर-हर महादेव के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय नजर आया।

मराठा काल की विरासत में बसती है भोलेनाथ की भक्ति
सहारनपुर में भगवान शिव को समर्पित कई प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर हैं, लेकिन भूतेश्वर महादेव मंदिर की पहचान इन सबसे अलग है। यह मंदिर न केवल श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है, बल्कि इसके साथ मराठा शासनकाल की ऐतिहासिक विरासत भी जुड़ी हुई है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मंदिर में स्थापित शिवलिंग प्राकृतिक और स्वयंभू है। यही वजह है कि यहां सालभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन सावन के महीने में भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है।

मराठा शासनकाल से जुड़ी है मंदिर की कहानी

स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित इतिहास के अनुसार, भूतेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करीब 500 वर्ष पहले मराठा शासनकाल में कराया गया था। बताया जाता है कि जब सहारनपुर क्षेत्र में मराठा शासकों का प्रभाव था, उस समय वे भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। शिवभक्ति से प्रभावित होकर मराठा शासकों ने क्षेत्र में कई शिवालयों का निर्माण कराया। कहा जाता है कि मराठा काल में सहारनपुर में चार प्रमुख शिव मंदिरों की स्थापना की गई थी। इनमें भूतेश्वर महादेव, पातालेश्वर महादेव, बागेश्वर महादेव और पाठेश्वर महादेव मंदिर शामिल बताए जाते हैं। इन सभी मंदिरों में भूतेश्वर महादेव मंदिर को विशेष महत्व प्राप्त है। मंदिर की प्राचीनता और इसकी स्थापत्य शैली आज भी श्रद्धालुओं और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों को आकर्षित करती है। मंदिर परिसर में मौजूद कई संरचनाएं मराठा काल की याद दिलाती हैं। यहां मौजूद छत्रियां और अन्य स्थापत्य अवशेष मंदिर के गौरवशाली अतीत की कहानी बयां करते हैं।

मंदिर से जुड़ी हैं कई धार्मिक मान्यताएं

भूतेश्वर महादेव मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था कई धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से लगातार 40 दिनों तक भगवान शिव का जलाभिषेक करता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है और जीवन में आने वाली परेशानियां दूर होती हैं। इसी मान्यता के चलते कई श्रद्धालु सावन के महीने में लगातार मंदिर पहुंचकर जलाभिषेक करते हैं। कुछ भक्त हर दिन सुबह मंदिर पहुंचते हैं और भगवान शिव को गंगाजल, दूध और बेलपत्र अर्पित करते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, मराठा शासकों ने उस समय शिव मंदिरों के आसपास बेलपत्र के पेड़ भी लगवाए थे। इसका उद्देश्य यह था कि भगवान शिव की पूजा करने वाले भक्तों को बेलपत्र आसानी से उपलब्ध हो सके। शिव पूजा में बेलपत्र का विशेष महत्व माना जाता है और सावन के दौरान श्रद्धालु भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित कर अपनी आस्था प्रकट करते हैं।

मराठा काल की विरासत में बसती है भोलेनाथ की भक्ति
सावन में बढ़ जाती है श्रद्धालुओं की संख्या

वैसे तो भूतेश्वर महादेव मंदिर में वर्षभर श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है, लेकिन सावन के महीने में यहां भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। सावन के प्रत्येक सोमवार को मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और जलाभिषेक के लिए श्रद्धालु सुबह से ही पहुंचने लगते हैं। हरिद्वार से गंगाजल लेकर लौटने वाले कांवड़िये भी भगवान शिव के विभिन्न मंदिरों में जलाभिषेक करते हैं। ऐसे में सहारनपुर और आसपास के क्षेत्र के शिवालयों में भी कांवड़ियों और स्थानीय श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या दिखाई देती है। भूतेश्वर महादेव मंदिर में भी सावन के पहले सोमवार को भक्तों की भारी भीड़ पहुंची। श्रद्धालुओं ने कतार में लगकर बाबा के दर्शन किए और जलाभिषेक किया। मंदिर परिसर में सुरक्षा और व्यवस्था के लिए भी विशेष इंतजाम किए गए।

मंदिर में मौजूद हैं संतों की समाधियां

भूतेश्वर महादेव मंदिर की एक और खासियत यहां मौजूद संतों की समाधियां हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, मंदिर परिसर में करीब 20 संतों की समाधियां हैं। कहा जाता है कि अलग-अलग समय में ऋषि-मुनियों और संतों ने यहां साधना की और समाधि ली। इन समाधियों को भी श्रद्धालु बेहद पवित्र मानते हैं। मंदिर में भगवान शिव के दर्शन के साथ भक्त इन समाधियों के भी दर्शन करते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से यहां प्रार्थना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मंदिर परिसर में मौजूद प्राचीन छत्रियां भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। इन छत्रियों को संतों की इच्छा समाधि से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि इनसे जुड़ी मान्यताएं स्थानीय परंपराओं और धार्मिक आस्था पर आधारित हैं, लेकिन मंदिर की ऐतिहासिक पहचान में इनका विशेष स्थान है।

आस्था और इतिहास का संगम है भूतेश्वर महादेव

भूतेश्वर महादेव मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां धर्म, इतिहास और संस्कृति तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। एक तरफ स्वयंभू माने जाने वाले शिवलिंग के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है, तो दूसरी तरफ मंदिर की वास्तुकला और मराठा काल से जुड़ी मान्यताएं इसे ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती हैं। सावन के पहले सोमवार को उमड़ा शिवभक्तों का सैलाब इस बात की गवाही देता है कि सदियों पुरानी यह आस्था आज भी उतनी ही मजबूत है। सुबह से शाम तक मंदिर में श्रद्धालुओं का आना-जाना जारी रहा। कोई अपनी मनोकामना लेकर पहुंचा, तो कोई बाबा का आशीर्वाद लेने।

सहारनपुर के लिए भूतेश्वर महादेव मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का भी हिस्सा है। सावन के पवित्र महीने में जब पूरा उत्तर भारत भोलेनाथ की भक्ति में डूबा हुआ है, तब इस प्राचीन मंदिर में गूंजते हर-हर महादेव के जयकारे इसकी आध्यात्मिक महत्ता को और बढ़ा देते हैं। भूतेश्वर महादेव की यही खासियत है कि यहां आस्था केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि सदियों पुराने इतिहास और परंपरा के साथ आगे बढ़ती दिखाई देती है। सावन के हर सोमवार को यहां पहुंचने वाला हर श्रद्धालु अपने साथ एक उम्मीद, एक विश्वास और बाबा भोलेनाथ के प्रति अटूट भक्ति लेकर लौटता है।

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