नैनीताल : उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रेलवे की भूमि पर कथित अवैध कब्जे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को केवल प्रशासनिक नोटिस के आधार पर उसकी संपत्ति या कब्जे वाली जगह से नहीं हटाया जा सकता। अदालत ने कहा कि चाहे कब्जा अवैध ही क्यों न हो, तब भी बेदखली केवल कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने और सक्षम न्यायालय के आदेश के बाद ही की जा सकती है। बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी को जबरन हटाना संविधान और मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा।
यह महत्वपूर्ण आदेश वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने सुनाया। अदालत ने रेलवे प्रशासन द्वारा जारी एक नोटिस को निरस्त करते हुए कहा कि संबंधित कार्रवाई विधि सम्मत प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई थी।
मामला मसूरी के झड़ीपानी क्षेत्र स्थित एक संपत्ति से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वह विवादित संपत्ति उनके स्वामित्व में है। दूसरी ओर, नॉर्दर्न रेलवे के सीनियर सेक्शन इंजीनियर (वर्क्स), देहरादून की ओर से वर्ष 2023 में एक नोटिस जारी कर आरोप लगाया गया कि संबंधित लोग रेलवे की भूमि पर अनधिकृत रूप से कब्जा किए हुए हैं और उन्हें निर्धारित समय के भीतर जमीन खाली करने का निर्देश दिया गया।
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि नोटिस उनके घरों पर चस्पा कर दिया गया, लेकिन उन्हें अपना पक्ष रखने या सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया गया। उनका तर्क था कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना उन्हें बेदखल करने की कोशिश की गई।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह वैध स्वामी हो या भूमि पर कब्जा करने वाला, अपने हाथ में कानून लेने की अनुमति नहीं देता। अदालत ने कहा कि किसी भी स्थापित कब्जे को हटाने के लिए सक्षम न्यायालय से आदेश प्राप्त करना आवश्यक है। संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर देना और तथ्यों की जांच करना न्यायिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बिना कानूनी मंजूरी के किसी व्यक्ति को अचल संपत्ति से जबरन बेदखल करना न केवल संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह मानवाधिकारों के भी विपरीत है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति अवैध कब्जे में भी है, तब भी उसे हटाने के लिए विधिक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
अदालत ने पाया कि रेलवे द्वारा 5 अक्टूबर 2023 को जारी किया गया नोटिस किसी वैधानिक प्रक्रिया के तहत जारी नहीं किया गया था। इसलिए केवल 30 दिनों के भीतर जमीन खाली करने का प्रशासनिक आदेश कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उक्त नोटिस को निरस्त कर दिया।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि अवैध कब्जाधारियों को संरक्षण मिल गया है। रेलवे यदि भूमि पर अवैध कब्जा साबित करना चाहता है तो वह कानून के अनुरूप सक्षम न्यायालय या संबंधित वैधानिक प्रक्रिया अपनाकर कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। हाईकोर्ट के इस फैसले को संपत्ति अधिकारों, प्राकृतिक न्याय और विधिक प्रक्रिया के पालन के लिहाज से एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

