सहारनपुर : सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद का मलबा हटाने के दौरान सामने आया कुआं अब चर्चा का केंद्र बन गया है। करीब 20 फीट गहरे इस कुएं को लेकर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं। कुआं सामने आने के बाद प्रशासन ने इसकी जानकारी पुरातत्व विभाग को दी, जिसके बाद सोमवार को लखनऊ पुरातत्व विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया। टीम ने प्रारंभिक निरीक्षण में इसे कूप यानी कुएं जैसी संरचना बताया है। हालांकि, पुरातत्व विभाग ने साफ किया है कि अभी इसे पूरी तरह कुआं कहना जल्दबाजी होगी। इसके वास्तविक स्वरूप और निर्माण के उद्देश्य को लेकर विस्तृत जांच के बाद ही अंतिम निष्कर्ष सामने आ सकेगा।

आपको बता दें कि सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद मस्जिद के निचे कुआं मिलने से रहस्य बन गया। जिसके चलते जिला प्रशासन ने पुरातत्व विभाग से कुएं और उसके इतिहास की जानकारी के लिए जांच कराने का फैसला किया। सोमवार को मौके का निरीक्षण करने लखनऊ पुरातत्व विभाग के सहायक अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव अपनी टीम के साथ पहुंचे। जहां उन्होंने कुएं में उतर कर बारीकी से निरीक्षण किया और कुछ सैंपल लिये। प्रारंभिक तौर पर इसकी बनावट और निर्माण शैली को देखते हुए उन्होंने इसे कूप जैसी संरचना बताया। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया इसे कुएं जैसा कहा जा सकता है, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभी यह पूरी तरह प्रमाणित नहीं है कि यह कुआं ही है।
डॉ. मनोज कुमार यादव के मुताबिक, संरचना प्रथम दृष्टया वास्तुकला या वस्तु कला से संबंधित दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि किसी भी प्राचीन संरचना के बारे में अंतिम राय देने से पहले उसके निर्माण की शैली, सामग्री, स्थिति और अन्य पुरातात्विक साक्ष्यों का अध्ययन करना जरूरी होता है। फिलहाल विभाग की ओर से मौके का निरीक्षण किया गया है और आगे की प्रक्रिया प्रशासन तथा शासन के निर्णय पर निर्भर करेगी। निरीक्षण के दौरान सामने आया कि इस संरचना की चौड़ाई करीब तीन से चार फीट है, जबकि इसकी गहराई लगभग 20 फीट मापी गई है। संरचना के निर्माण में लखौरी ईंटों का इस्तेमाल किया गया है। पुरातत्व विभाग के अनुसार, लखौरी ईंटें पुराने समय में इस्तेमाल होने वाली पतली और विशेष प्रकार की ईंटें हैं। मौके पर मौजूद निर्माण सामग्री को देखते हुए संरचना को प्रथम दृष्टया करीब 200 से 250 साल पुराना यानि वैदिक काल का बताया जा रहा है।

हालांकि, पुरातत्व विभाग ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह संरचना ठीक किस वर्ष या किस ऐतिहासिक दौर में बनाई गई थी। इसके अलावा अभी तक ऐसी कोई आकृति, शिलालेख, प्रतीक या अन्य स्पष्ट पुरातात्विक प्रमाण भी नहीं मिला है, जिसके आधार पर इसके निर्माण का समय या उद्देश्य निश्चित रूप से बताया जा सके। संरचना के अंदर पानी का स्तर भी काफी नीचे चला गया है। ऐसे में यह भी स्पष्ट नहीं है कि इसका मूल इस्तेमाल पानी के स्रोत के तौर पर होता था या इसका कोई दूसरा उद्देश्य था। इसकी बनावट कुएं जैसी जरूर दिखाई दे रही है, लेकिन पुरातत्व विभाग फिलहाल सावधानी बरतते हुए इसे केवल ‘कूप जैसी संरचना’ कह रहा है।
सहारनपुर का इतिहास काफी पुराना रहा है और अलग-अलग दौर में यहां कई शासकों तथा राजवंशों का प्रभाव रहा है। ऐसे में प्राचीन संरचना सामने आने के बाद इसे किसी खास शासक या ऐतिहासिक काल से जोड़कर देखे जाने की चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। हालांकि, पुरातत्व विभाग ने ऐसी किसी भी संभावना पर फिलहाल टिप्पणी करने से इनकार किया है। डॉ. मनोज कुमार यादव ने कहा कि सहारनपुर में अलग-अलग समय में कई शासकों का आगमन हुआ है, लेकिन केवल इस आधार पर इस संरचना को किसी विशेष शासक से जोड़ना उचित नहीं होगा। इसके लिए पर्याप्त ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों की जरूरत होगी। विभाग का कहना है कि जांच के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना सही नहीं होगा।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस स्थान पर आगे और खुदाई की जाएगी? इसको लेकर पुरातत्व विभाग का कहना है कि खुदाई का निर्णय प्रशासन और शासन स्तर से लिया जाएगा। यदि आगे व्यवस्थित खुदाई की अनुमति मिलती है तो संरचना के आसपास के हिस्से की भी जांच की जा सकती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि संरचना अकेली थी या इसके आसपास भी किसी पुराने निर्माण के अवशेष मौजूद हैं। आगे की खुदाई से संरचना के निर्माण काल, इस्तेमाल और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आने की संभावना हो सकती है। साथ ही यह भी पता लगाया जा सकता है कि लखौरी ईंटों से बनी इस संरचना का इस्तेमाल वास्तव में पानी के स्रोत के तौर पर किया जाता था या यह किसी अन्य निर्माण का हिस्सा थी।
फिलहाल कलेक्ट्रेट परिसर में मिली इस प्राचीन संरचना को लेकर रहस्य बना हुआ है। करीब 20 फीट गहराई और तीन से चार फीट चौड़ाई वाली इस संरचना में इस्तेमाल हुई लखौरी ईंटें इसे पुराना जरूर बताती हैं, लेकिन इसका वास्तविक इतिहास अभी सामने नहीं आया है। पुरातत्व विभाग के प्रारंभिक निरीक्षण के बाद अब सभी की निगाहें प्रशासन और शासन के अगले फैसले पर टिकी हैं। यदि आगे खुदाई और विस्तृत पुरातात्विक जांच की अनुमति मिलती है, तो संभव है कि सहारनपुर के इतिहास से जुड़ा कोई नया अध्याय सामने आए।

