विजय कुमार शर्मा की कहानी: पढ़ाते-पढ़ाते खुद भी पढ़ते रहे, लंबी जिद के बाद बने टीजीटी संस्कृत शिक्षक
बागपत : कहते हैं कि सपनों को पूरा करने की कोई उम्र नहीं होती, जरूरत होती है तो बस उन्हें हासिल करने की जिद और लगातार प्रयास करने की। बागपत के बिजवाड़ा गांव निवासी विजय कुमार शर्मा ने इस बात को अपनी जिंदगी में सच साबित कर दिया। करीब 27 वर्षों तक संघर्ष, इंतजार और लगातार मेहनत के बाद 59 वर्ष 8 माह की उम्र में उनका चयन टीजीटी संस्कृत शिक्षक के पद पर हुआ है। 22 सितंबर 2026 को लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों उन्हें नियुक्ति पत्र मिला।

विजय कुमार की यह उपलब्धि इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने उस उम्र में यह मुकाम हासिल किया, जब आमतौर पर लोग नौकरी की नई शुरुआत के बजाय सेवानिवृत्ति के बारे में सोचने लगते हैं। लेकिन विजय के लिए उम्र कभी लक्ष्य के बीच नहीं आई। उन्होंने वर्षों तक अपने लक्ष्य को सामने रखा और हर परिस्थिति में प्रयास जारी रखा।
नौकरी करते रहे, लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी
विजय कुमार लंबे समय से शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। दून पब्लिक स्कूल में शिक्षक के रूप में बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ उन्होंने खुद की पढ़ाई भी जारी रखी। एक तरफ स्कूल में विद्यार्थियों की जिम्मेदारी और दूसरी तरफ अपने लक्ष्य के लिए तैयारी—दोनों को साथ लेकर चलना उनके लिए आसान नहीं था।
वह मनोविज्ञान, इतिहास और संस्कृत विषयों के शिक्षक रहे हैं। इन विषयों की शिक्षा देते हुए उन्होंने खुद भी लगातार ज्ञान अर्जित किया। उनके लिए पढ़ाना सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि सीखने और सिखाने की लगातार चलने वाली प्रक्रिया रही।
27 साल तक नहीं बदली मंजिल
विजय कुमार के संघर्ष की सबसे बड़ी कहानी यही है कि उन्होंने करीब 27 वर्षों तक अपने लक्ष्य का पीछा नहीं छोड़ा। इस लंबे सफर में कई बार परिस्थितियां बदलीं, समय बदला और उम्र बढ़ती गई, लेकिन लक्ष्य वही रहा।
कई युवाओं के लिए एक-दो असफल प्रयास निराशा का कारण बन जाते हैं। ऐसे में विजय का 27 वर्षों तक प्रयास करते रहना उनकी दृढ़ता को दिखाता है। उन्होंने असफलताओं को रुकावट मानने के बजाय आगे की तैयारी का हिस्सा बनाया।
आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और करीब 59 वर्ष 8 माह की उम्र में उन्हें टीजीटी संस्कृत शिक्षक के पद पर चयनित होने का अवसर मिला।
मुख्यमंत्री से मिला नियुक्ति पत्र
22 सितंबर को लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित कार्यक्रम विजय कुमार के लिए यादगार बन गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों उन्हें नियुक्ति पत्र मिला। वर्षों के संघर्ष के बाद जब यह पत्र उनके हाथ में आया तो उनके लिए यह सिर्फ सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र नहीं था, बल्कि लंबे इंतजार और मेहनत की मंजिल थी।
परिवार में भी शिक्षा और सेवा का माहौल
विजय कुमार शर्मा के परिवार में भी शिक्षा और सरकारी सेवा की झलक दिखाई देती है। उनके पांच बच्चे हैं, जिनमें तीन बेटियां शादीशुदा हैं। उनका बेटा आदित्य उत्तर प्रदेश पुलिस में उपनिरीक्षक है, जबकि शिवम यूपी पुलिस में आरक्षक के पद पर कार्यरत है। परिवार के सभी सदस्य शिक्षित हैं। विजय ने अपनी शिक्षा बड़ावद, बिजवाड़ा और बड़ौत से पूरी की। शिक्षा के प्रति उनका जुड़ाव आगे चलकर उनके पेशे और जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
युवाओं के लिए छोड़ गए बड़ी सीख
विजय कुमार शर्मा की कहानी उन युवाओं के लिए भी एक संदेश है, जो छोटी असफलताओं के बाद अपने लक्ष्य को छोड़ देते हैं। उनका सफर बताता है कि सफलता हमेशा तुरंत नहीं मिलती। कभी-कभी मंजिल तक पहुंचने में वर्षों लग जाते हैं।
उनकी कहानी का सार यही है कि लक्ष्य स्पष्ट हो, सीखने की इच्छा बनी रहे और प्रयास रुकने न पाए तो उम्र भी सफलता की राह में दीवार नहीं बनती। 59 वर्ष की उम्र में टीजीटी संस्कृत शिक्षक बनकर विजय कुमार शर्मा ने न केवल अपने 27 साल के संघर्ष को मुकाम दिया, बल्कि यह भी साबित किया कि सपनों की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।

