लखनऊ : उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज होती दिख रही है। बसपा सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर निशाना साधा। उन्होंने समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सपा का पीडीए सामाजिक न्याय की राजनीति के बजाय राजनीतिक छलावा है।
मायावती ने अपने पोस्ट में समाजवादी पार्टी के हालिया राज्यसभा उम्मीदवारों का भी जिक्र किया। सपा ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रो. रामगोपाल यादव और कारोबारी धनराज परिमल नाथवानी को उम्मीदवार बनाया है। दोनों प्रत्याशियों ने 30 सितंबर को अखिलेश यादव की मौजूदगी में नामांकन दाखिल किया था।
राज्यसभा टिकट को लेकर साधा निशाना
मायावती ने रामगोपाल यादव और धनराज नाथवानी को प्रत्याशी बनाए जाने को सपा की राजनीति से जोड़ते हुए परिवारवाद और धनबल का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा चुनाव के समय पीडीए वर्ग से समर्थन मांगती है, लेकिन टिकट वितरण में परिवार और बड़े आर्थिक रूप से प्रभावशाली लोगों को प्राथमिकता देती है।
बसपा प्रमुख ने कहा कि उनकी पार्टी चुनाव में अपने परिवार के सदस्यों, सगे-संबंधियों या रिश्तेदारों को टिकट देने की परंपरा नहीं अपनाती। उन्होंने दावा किया कि बसपा संगठन में काम करने वाले सर्वसमाज के गरीब, मध्यम वर्ग और कमजोर तबकों के कार्यकर्ताओं को उम्मीदवार बनाने पर जोर देती है।
मायावती ने सपा की राजनीति को इसके विपरीत बताते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी खुद को समाजवादी और पीडीए की पार्टी बताती है, लेकिन उसके फैसलों में उन्हें इसका उलट नजर आता है। उनके मुताबिक, राज्यसभा उम्मीदवारों का चयन इसका ताजा उदाहरण है।
‘पीडीए के नाम पर राजनीतिक ढोंग’ का आरोप
मायावती ने अपने पोस्ट में सपा के पीडीए को लेकर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा पीडीए के नाम पर राजनीतिक ढोंग और छलावा कर रही है। उन्होंने कहा कि चुनाव में वोट पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज से मांगे जाते हैं, लेकिन प्रतिनिधित्व के सवाल पर परिवार के लोगों और बड़े पूंजीपतियों को आगे किया जाता है।
बसपा प्रमुख ने यह भी दावा किया कि सपा की यह राजनीति कोई नई बात नहीं है, बल्कि पार्टी के राजनीतिक तौर-तरीकों का हिस्सा रही है। उन्होंने अपने समर्थकों और प्रदेश की जनता से सपा के पीडीए अभियान को लेकर सतर्क रहने की अपील की।
धनराज नाथवानी की उम्मीदवारी बनी चर्चा का विषय
सपा के दूसरे राज्यसभा उम्मीदवार धनराज परिमल नाथवानी की उम्मीदवारी इस बार राजनीतिक चर्चा का प्रमुख विषय बनी है। धनराज नाथवानी कॉरपोरेट क्षेत्र से जुड़े हैं और रिलायंस समूह से संबंधित पद पर कार्यरत रहे हैं। उनके पिता परिमल नाथवानी भी राज्यसभा सदस्य हैं। सपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए प्रत्याशी बनाया है।
मायावती ने इसी पृष्ठभूमि को अपने हमले का आधार बनाया और सपा की पीडीए तथा समाजवाद की राजनीति पर सवाल खड़े किए। हालांकि, सपा की ओर से उम्मीदवार चयन को लेकर पार्टी का अपना राजनीतिक तर्क है और मायावती की टिप्पणियां उनके राजनीतिक रुख का हिस्सा हैं।
तीसरे उम्मीदवार पर भी मायावती का तंज
मायावती ने सपा के संभावित तीसरे उम्मीदवार को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि तीसरा प्रत्याशी भी पहले की तरह संभवतः चुनावी रणनीति और ‘फेस सेविंग’ के लिए उतारा जा सकता है। हालांकि, उनके बयान के समय सपा की ओर से तीसरे उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं किया गया था। सपा ने शुरुआती तौर पर दो उम्मीदवारों के नाम घोषित किए थे।
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए चुनाव प्रक्रिया चल रही है। सपा के दो उम्मीदवारों के नामांकन के बाद अब तीसरे प्रत्याशी को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा बनी हुई है।
2027 से पहले बढ़ेगी सियासी बयानबाजी
मायावती का यह हमला ऐसे समय आया है, जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर राजनीतिक दल सक्रिय हैं। सपा लगातार पीडीए सामाजिक समीकरण को अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बता रही है, जबकि बसपा अपने पारंपरिक सामाजिक आधार के बीच संगठन को मजबूत करने पर जोर दे रही है।
मायावती ने अपने बयान के अंत में दलित, आदिवासी, अति पिछड़े, मुस्लिम और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के साथ-साथ गरीब सवर्णों को भी संबोधित किया। उन्होंने दावा किया कि इन वर्गों का भविष्य बसपा में सुरक्षित है और अन्य राजनीतिक दलों की ओर से उन्हें केवल छलावा मिलता है।
इस तरह राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन को लेकर शुरू हुई बहस अब सपा के पीडीए, परिवारवाद और सामाजिक प्रतिनिधित्व की राजनीति तक पहुंच गई है। आने वाले दिनों में सपा की ओर से मायावती के आरोपों पर प्रतिक्रिया आने के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है।

