सहारनपुर से लखनऊ तक इमरान मसूद की नई परीक्षा, अब मुस्लिम चेहरे से आगे संगठन की चुनौती

Imran Masood

सहारनपुर : सहारनपुर की सियासत से निकलकर प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में अहम भूमिका तक पहुंचे सांसद इमरान मसूद के सामने अब जिम्मेदारी का दायरा काफी बढ़ गया है। कांग्रेस ने उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। यह बदलाव 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच हुआ है। पार्टी ने आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, जबकि इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है।

नई जिम्मेदारी के साथ मसूद के सामने चुनौती केवल पश्चिमी यूपी में अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की नहीं, बल्कि उसे प्रदेश संगठन की रणनीति में बदलने की भी है। 2024 लोकसभा चुनाव में सहारनपुर से जीत के बाद उनका राजनीतिक कद बढ़ा। अब प्रदेश संगठन में भूमिका मिलने के बाद उनकी सक्रियता का दायरा सहारनपुर से बाहर भी बढ़ना तय माना जा रहा है।

तीन मोर्चों पर होगी असली परीक्षा

इमरान मसूद की नई भूमिका को तीन प्रमुख मोर्चों से जोड़कर देखा जा सकता है। पहला पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस संगठन को मजबूत करना है। दूसरा, अलग-अलग सामाजिक वर्गों के बीच कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ाना और तीसरा, समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस का पक्ष मजबूती से रखना।

पश्चिमी यूपी में मसूद की पहचान प्रभावशाली मुस्लिम नेता के रूप में रही है। लेकिन कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उनसे अपेक्षा केवल किसी एक सामाजिक समूह तक सीमित रहने की नहीं होगी। पार्टी को बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और दूसरे क्षेत्रों में कांग्रेस के लिए राजनीतिक जमीन तैयार करने की चुनौती होगी।

सपा के साथ सीट शेयरिंग सबसे बड़ी कसौटी

2027 चुनाव से पहले कांग्रेस और सपा के बीच गठबंधन और सीट बंटवारे को लेकर बयानबाजी तेज है। 28 सितंबर को इमरान मसूद ने अखिलेश यादव को लेकर कहा था कि अगर वह गठबंधन से नाराज हैं तो नुकसान उनका ही होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि उत्तर प्रदेश में नेतृत्व करने के लिए बड़ा दिल दिखाना जरूरी है।

कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद मसूद के ऐसे बयानों का राजनीतिक महत्व भी बढ़ गया है। अब उनके सार्वजनिक बयान केवल सहारनपुर के सांसद की प्रतिक्रिया के तौर पर नहीं, बल्कि प्रदेश कांग्रेस की राजनीति के संदर्भ में भी देखे जाएंगे। यही वजह है कि सपा-कांग्रेस सीट बंटवारे में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

पश्चिमी यूपी में स्थानीय समीकरण भी चुनौती

सहारनपुर में कांग्रेस और सपा नेताओं के बीच स्थानीय स्तर पर मतभेद भी सामने आते रहे हैं। अगस्त में दिशा बैठक के दौरान इमरान मसूद और सपा विधायक आशु मलिक के बीच तीखी बहस हुई थी। बैठक में सड़क और विकास कार्यों से जुड़े सवालों को लेकर दोनों नेताओं के बीच नोकझोंक हुई थी।

यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनावी गठबंधन केवल शीर्ष नेताओं की सहमति से नहीं चलता। स्थानीय स्तर पर दोनों दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल भी उतना ही जरूरी होगा। पश्चिमी यूपी में कांग्रेस-सपा के संभावित सीट समीकरण के बीच ऐसे स्थानीय मतभेद नई चुनौती बन सकते हैं।

बेबाकी अब ताकत भी, जिम्मेदारी भी

इमरान मसूद की राजनीति में बेबाक बयानबाजी उनकी पहचान रही है। यही शैली उन्हें समर्थकों के बीच अलग पहचान देती है, लेकिन प्रदेश संगठन में जिम्मेदारी बढ़ने के साथ यही बेबाकी उनके लिए चुनौती भी बन सकती है। गठबंधन की राजनीति में सीटों की बातचीत, स्थानीय नेताओं की महत्वाकांक्षाओं और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाना होगा।

कांग्रेस ने नई प्रदेश टीम के जरिए 2027 से पहले संगठन को सक्रिय करने का संकेत दिया है। ऐसे में इमरान मसूद के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या वह सहारनपुर और पश्चिमी यूपी में अपनी राजनीतिक पकड़ को पूरे प्रदेश में कांग्रेस के संगठनात्मक विस्तार में बदल पाते हैं।

यानी नई जिम्मेदारी के साथ उनकी पहचान का दायरा भी बदलने वाला है। अब परीक्षा केवल एक प्रभावशाली मुस्लिम चेहरे के रूप में नहीं, बल्कि प्रदेश स्तर के संगठनकर्ता और गठबंधन की राजनीति में कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिक चेहरे के रूप में होगी। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यही इमरान मसूद की सबसे बड़ी राजनीतिक कसौटी साबित हो सकती है।

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