सीमा को स्थायी रूप से चिह्नित करने के लिए पिलरों को जमीन में करीब 55 फीट की गहराई तक स्थापित किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि यमुना की धारा में बदलाव होने या नदी के कटाव के कारण जमीन की भौगोलिक स्थिति प्रभावित होने के बावजूद सीमा चिह्नों की पहचान बनी रहे। इससे दोनों राज्यों के बीच सीमा को लेकर होने वाली असमंजस की स्थिति दूर करने में मदद मिलेगी।
यूपी और हरियाणा लगाएंगे अपने-अपने पिलर
योजना के तहत सहारनपुर क्षेत्र में लगाए जाने वाले 330 पिलरों में से 164 पिलर उत्तर प्रदेश की ओर से स्थापित किए जाएंगे। शेष पिलर हरियाणा की ओर से लगाए जाएंगे। दोनों राज्य अपने हिस्से के पिलर लगाने का खर्च स्वयं वहन करेंगे। पिलरों को बारी-बारी से दोनों राज्यों की ओर से स्थापित किया जाएगा।
उत्तर प्रदेश की ओर से 164 पिलर लगाने पर करीब पांच करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। पिलरों को मजबूत बनाने और उनकी पहचान लंबे समय तक बरकरार रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। प्रशासन को उम्मीद है कि इस व्यवस्था से भविष्य में नदी के बहाव में बदलाव के कारण सीमा निर्धारण को लेकर पैदा होने वाली समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
नदी की धारा बदलने से पैदा होते हैं विवाद
यमुना के किनारे बसे गांवों में जमीन की सीमा का विवाद लंबे समय से किसानों के लिए परेशानी का कारण बना हुआ है। नदी का बहाव बदलने और कटाव होने से खेतों की भौगोलिक स्थिति में परिवर्तन आ जाता है। ऐसे में कई बार किसानों को अपनी जमीन की वास्तविक सीमा को लेकर असमंजस का सामना करना पड़ता है।
कुछ स्थानों पर किसानों की जमीन नदी में समा जाती है, जबकि दूसरी जगह नदी की धारा बदलने से जमीन की स्थिति में परिवर्तन हो जाता है। इसके बाद खेतों के स्वामित्व और वास्तविक सीमा को लेकर विवाद पैदा होते हैं। कई मामलों में ये विवाद आपसी टकराव तक पहुंच जाते हैं। ऐसी स्थिति में प्रशासन और दोनों राज्यों की सरकारों को हस्तक्षेप करना पड़ता है।
एडीएम वित्त सलिल कुमार पटेल के अनुसार, यमुना के तटीय क्षेत्रों में जमीन की सीमा लंबे समय से विवाद का विषय रही है। नदी के बहाव में बदलाव के कारण किसानों के खेत प्रभावित होते हैं, जिससे वास्तविक सीमा और स्वामित्व को लेकर समस्याएं उत्पन्न होती हैं। सीमा निर्धारण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन समस्याओं को दूर करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है मामला
उत्तर प्रदेश और हरियाणा के बीच जमीन की सीमा को लेकर विवाद की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंच चुका है। विवादों का स्थायी समाधान तलाशने के लिए सर्वे ऑफ इंडिया के माध्यम से दोनों राज्यों की सीमा का सर्वे कराकर स्पष्ट निर्धारण करने का फैसला लिया गया। अब इसी योजना के तहत पिलर स्थापित किए जा रहे हैं।
यह कवायद केवल सहारनपुर तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा के बीच सहारनपुर के अलावा शामली, बागपत, गौतमबुद्धनगर, मथुरा और अलीगढ़ समेत अन्य जिलों की सीमाओं पर भी पिलर लगाए जाने हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, संबंधित जनपदों की सीमा पर उत्तर प्रदेश की ओर से 400 से अधिक पिलर स्थापित किए जाएंगे।
जून 2027 तक काम पूरा करने का लक्ष्य
प्रशासन ने सीमा निर्धारण की पूरी प्रक्रिया जून 2027 तक पूरी करने का लक्ष्य रखा है। फिलहाल सहारनपुर में सर्वे का करीब एक चौथाई काम पूरा हो चुका है। आने वाले समय में पिलर लगाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा।
इस योजना से यमुना के किनारे खेती करने वाले किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है। सीमा स्पष्ट होने से जमीन को लेकर बार-बार पैदा होने वाले विवादों और प्रशासनिक उलझनों में कमी आ सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि सीमा निर्धारण कितना सटीक होता है और जमीन के स्वामित्व से जुड़े पुराने विवादों का निपटारा किस तरह किया जाता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यमुना की धारा भले ही समय के साथ अपना रास्ता बदलती रहे, लेकिन दोनों राज्यों के बीच निर्धारित सीमा को स्पष्ट और स्थायी रूप से चिह्नित करने की यह पहल किसानों के लिए लंबे समय से चली आ रही परेशानी का समाधान बन सकती है।

