सहारनपुर : सहारनपुर में भीषण गर्मी से राहगीरों को राहत देने के नाम पर नगर निगम ने 32 लाख रुपये खर्च कर शहर के प्रमुख चौराहों पर ग्रीन नेट और मिस्ट स्प्रे सिस्टम लगवाए थे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह पूरी व्यवस्था पहली ही तेज हवा और आंधी में उखड़कर धराशाही हो गई। जिस व्यवस्था को जून और जुलाई की गर्मी में लोगों को राहत देने के लिए बनाया गया था, वह दो दिन भी नहीं टिक सकी। हल्की से हवा आई तो ग्रीन नेट फट गए, बांस-बल्लियां और लोहे के एंगल सड़क पर गिर पड़े। राहत की बात ये है कि बल्लियां और लोहे के पाइप गिरने से किसी राहगीर को नुकसान नहीं हुआ। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर 32 लाख रुपये खर्च होने के बावजूद इतनी कमजोर व्यवस्था कैसे तैयार की गई?
मामला सामने आने के बाद नगर निगम ने जलकल विभाग को नोटिस जारी कर अपने दायित्व से पल्ला झाड़ने की कोशिश की है। नगर आयुक्त ने टेंडर की शर्तों के उल्लंघन, घटिया गुणवत्ता और खराब सामग्री के इस्तेमाल को इसकी वजह माना है। नगर आयुक्त ने साफ कहा है कि ग्रीन नेट की गुणवत्ता खराब थी, जिसके कारण पूरी व्यवस्था पहली ही आंधी में धराशायी हो गई। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब काम कराया जा रहा था, तब गुणवत्ता की जांच किसने की? बिना उचित परीक्षण और सुरक्षा मानकों की पुष्टि के ग्रीन नेट और मिस्ट स्प्रे सिस्टम कैसे स्थापित कर दिए गए? अब जब मामला उजागर हो गया है तो विभागीय स्तर पर खानापूर्ति और नोटिसबाजी शुरू हो गई है।
मामले की जानकारी मिलने पर नगर आयुक्त शिपू गिरि ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने जलकल विभाग को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट किया कि ग्रीन नेट लगाने में सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया। नगर आयुक्त ने कहा कि जिस प्रकार नेट फटे और उनके साथ लगे एंगल, क्लैप तथा एंकर बोल्ट उखड़ गए, उससे किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता था। उन्होंने इसे टेंडर की शर्तों का उल्लंघन और कार्य की गुणवत्ता में गंभीर कमी बताया है। नगर आयुक्त के अनुसार कमजोर और निम्नस्तरीय सामग्री के उपयोग के कारण ही यह व्यवस्था पहली ही आंधी में नष्ट हो गई। इससे नगर निगम और शासन की छवि को भी नुकसान पहुंचा है।
वहीं, महापौर डॉ. अजय कुमार ने कहा कि नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। जहां भी कमी पाई गई है, उसे तत्काल दूर कराया जाएगा और जिम्मेदार एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। नगर आयुक्त ने भविष्य के लिए कई सख्त निर्देश भी दिए हैं। इनमें सुरक्षा मानकों की अनदेखी करने वाली एजेंसी पर प्रति चौराहा 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाने, दोबारा गलती होने पर ब्लैकलिस्ट करने, बिना सत्यापन बिल पास न करने और कमजोर सामग्री मिलने पर 25 प्रतिशत भुगतान काटने जैसे प्रावधान शामिल हैं। साथ ही भविष्य में केवल आईएसआई मार्क या अनुमोदित ब्रांड के सामान के उपयोग और मौसम विभाग की चेतावनी पर ग्रीन नेट समेटने की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। अब बड़ा सवाल यह है कि जब जनता के टैक्स के 32 लाख रुपये खर्च किए गए, तो आखिर ऐसी व्यवस्था क्यों बनाई गई जो पहली ही आंधी में टिक नहीं सकी। शहरवासियों को राहत देने के लिए शुरू की गई योजना अब नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही है।
नगर आयुक्त ने निर्देश दिए हैं कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी करने वाली एजेंसी पर प्रति चौराहा केवल 10 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया जाए और दोबारा गलती होने पर ब्लैकलिस्ट किया जाए। लेकिन 32 लाख रुपये की योजना के सामने 10 हजार रुपये का जुर्माना ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है। जनता सवाल पूछ रही है कि क्या सरकारी धन की बर्बादी के लिए केवल नोटिस और मामूली जुर्माना ही पर्याप्त है? आखिर उन अधिकारियों और एजेंसियों की जवाबदेही कौन तय करेगा जिनकी लापरवाही से लाखों रुपये की परियोजना पहली ही हवा में उड़ गई?

