2027 UP चुनाव: कांग्रेस ने सपा से मांगी 105+ सीटें, बिहार जैसा फॉर्मूला नहीं चलेगा!

UP Assembly Elections 2027

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक हलचल तेज होती जा रही है। भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देने के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की संभावना बनी हुई है, लेकिन इस बार कांग्रेस ने सीट बंटवारे को लेकर अपना रुख पहले से कहीं अधिक स्पष्ट कर दिया है। पार्टी ने संकेत दिए हैं कि वह किसी भी कीमत पर “बिहार जैसी स्थिति” नहीं दोहराना चाहती और उत्तर प्रदेश में सम्मानजनक सीट साझेदारी की उम्मीद रखती है।

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यदि समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन होता है, तो उसे कम से कम 2017 विधानसभा चुनाव की तरह 105 सीटें मिलनी चाहिए। पार्टी का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में संगठन मजबूत हुआ है और 2024 लोकसभा चुनाव में गठबंधन की सफलता ने कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति को भी मजबूत किया है।

कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी एआईसीसी सचिव राजेश तिवारी ने कहा कि पार्टी भाजपा को हराने के लिए गठबंधन के पक्ष में है, लेकिन सीटों का बंटवारा सम्मानजनक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि बिहार विधानसभा चुनाव से कांग्रेस ने बड़ा सबक सीखा है। वहां पार्टी को कई ऐसी सीटें मिलीं, जहां जीत की संभावना बेहद कम थी। इसके अलावा कई सीटों पर सहयोगी दलों के बीच दोस्ताना मुकाबला भी देखने को मिला, जिसका नुकसान पूरे गठबंधन को उठाना पड़ा।

तिवारी का कहना है कि उत्तर प्रदेश में ऐसी स्थिति से बचना जरूरी है। उनका कहना है कि कांग्रेस को केवल संख्या के आधार पर सीटें नहीं चाहिए, बल्कि ऐसी सीटें भी मिलनी चाहिए जहां पार्टी के जीतने की वास्तविक संभावना हो। उन्होंने यह भी कहा कि यदि गठबंधन सम्मानजनक नहीं हुआ तो कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ने के विकल्प पर भी विचार कर सकती है।

कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि उत्तर प्रदेश में पार्टी के पास खोने के लिए बहुत कम है। वर्तमान विधानसभा में कांग्रेस के केवल दो विधायक हैं, लेकिन पार्टी का मानना है कि यदि वह अकेले मैदान में उतरती है तो अपने संगठन को और मजबूत करने का अवसर मिलेगा। वहीं समाजवादी पार्टी के लिए दांव कहीं अधिक बड़ा है, क्योंकि वह 2017 से सत्ता से बाहर है और 2027 में सरकार बनाने की कोशिश कर रही है।

इसी संदर्भ में कांग्रेस नेताओं का कहना है कि गठबंधन को सफल बनाने के लिए समाजवादी पार्टी को बड़ा दिल दिखाना होगा। उनका मानना है कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता तभी प्रभावी होगी जब दोनों दलों के बीच सीटों का बंटवारा संतुलित और व्यावहारिक होगा।

हालांकि कांग्रेस के पिछले विधानसभा चुनावों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं रही है। 2017 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के दौरान कांग्रेस ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन केवल 7 सीटें जीत सकी थी। इसके बाद 2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी ने लगभग पूरे प्रदेश में अपने दम पर चुनाव लड़ा और केवल दो सीटों पर जीत हासिल कर सकी।

इसके बावजूद कांग्रेस नेताओं का दावा है कि 2024 लोकसभा चुनाव ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का कहना है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन का सीधा फायदा दोनों दलों को मिला। उन्होंने कहा कि गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को बड़ा झटका दिया और विपक्ष को मजबूत स्थिति में पहुंचाया।

इमरान मसूद का दावा है कि कांग्रेस के “संविधान बचाओ” अभियान ने दलित और मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका लाभ समाजवादी पार्टी को भी मिला। उन्होंने कहा कि यदि यही रणनीति विधानसभा चुनाव में अपनाई जाती है तो भाजपा को कड़ी चुनौती दी जा सकती है।

वहीं समाजवादी पार्टी की ओर से फिलहाल कोई कठोर प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पार्टी के राज्यसभा सांसद जावेद अली खान ने कहा कि गठबंधन को लेकर विभिन्न नेताओं के बयान आते रहते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय दोनों दलों का शीर्ष नेतृत्व करेगा। उन्होंने कहा कि सीटों का बंटवारा केवल दावों के आधार पर नहीं बल्कि जमीनी स्थिति, संगठन की ताकत और चुनावी गणित को ध्यान में रखकर तय किया जाएगा।

जावेद अली खान ने यह भी याद दिलाया कि 2017 में कांग्रेस के पास 28 विधायक थे, इसलिए उसे 105 सीटें मिली थीं। वर्तमान में कांग्रेस के केवल दो विधायक हैं, हालांकि उसके छह लोकसभा सांसद हैं। ऐसे में सीटों के बंटवारे पर अंतिम फैसला कई राजनीतिक पहलुओं को ध्यान में रखकर होगा।

फिलहाल इतना साफ है कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीटों का बंटवारा सबसे अहम राजनीतिक मुद्दों में शामिल होने जा रहा है। दोनों दल सार्वजनिक रूप से गठबंधन बनाए रखने की बात कर रहे हैं, लेकिन सम्मानजनक सीट साझेदारी को लेकर बातचीत आसान नहीं दिख रही। आने वाले महीनों में यही तय करेगा कि विपक्ष भाजपा के खिलाफ संयुक्त मोर्चे के साथ चुनाव मैदान में उतरता है या फिर अलग-अलग राह चुनता है।

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