सहारनपुर में मस्जिद ध्वस्तीकरण पर चंद्रशेखर आजाद का तीखा हमला, बोले- आश्वासन के बावजूद अंधेरे में हुई कार्रवाई

Saharanpur police failed to stop MP Chandrashekhar from going to Meerut

सहारनपुर : उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद पर प्रशासन की ओर से की गई ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद चंद्रशेखर आजाद ने प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए इसे तानाशाहीपूर्ण रवैया बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने रात में बातचीत के दौरान कार्रवाई नहीं किए जाने का आश्वासन दिया था, लेकिन इसके बावजूद शनिवार सुबह-सवेरे अंधेरे में मस्जिद को ढहा दिया गया।

चंद्रशेखर आजाद ने प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कहा कि मस्जिद को लेकर चल रहे विवाद के संबंध में उन्होंने जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से रात में लंबी बातचीत की थी। बातचीत के दौरान उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि तत्काल कोई कार्रवाई नहीं होगी। उनका आरोप है कि प्रशासन ने इस आश्वासन के बावजूद सुबह अचानक कार्रवाई शुरू कर दी। उन्होंने कहा कि प्रशासन की इस कार्यप्रणाली से न केवल सवाल खड़े होते हैं, बल्कि लोगों का सरकारी व्यवस्था पर भरोसा भी प्रभावित होता है। चंद्रशेखर आजाद ने कार्रवाई को लेकर सबसे बड़ा सवाल न्यायिक आदेश की व्याख्या पर उठाया। उन्होंने दावा किया कि सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश में अतिक्रमण अथवा कब्जा हटाने की बात कही गई थी, जबकि मौके पर प्रशासन ने पूरी इमारत को ही ध्वस्त कर दिया।

उन्होंने सवाल किया कि यदि प्रशासन के पास केवल अतिक्रमण हटाने का आदेश था तो पूरी मस्जिद को गिराने का फैसला किस आधार पर लिया गया। अदालत के आदेश की शब्दावली और प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई के बीच अंतर की जांच होनी चाहिए। किसी भी कार्रवाई में प्रशासन को कानून और न्यायिक आदेशों की सीमा में रहकर काम करना चाहिए। उनका आरोप है कि इस मामले में जिस तरीके से कार्रवाई की गई उससे प्रशासन की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। आजाद समाज पार्टी प्रमुख ने मस्जिद के इतिहास का भी हवाला दिया। उन्होंने दावा किया कि कलेक्ट्रेट परिसर स्थित यह मस्जिद आजादी से पहले से अस्तित्व में है और ब्रिटिश काल की है। उन्होंने इसे वर्ष 1911 से भी पुराना बताया।

चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि जब कोई धार्मिक स्थल दशकों या लंबे समय से अस्तित्व में रहा हो तो उसके संबंध में कोई भी फैसला बेहद संवेदनशील तरीके से और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया जाना चाहिए। सवाल उठाया कि इतने पुराने धार्मिक स्थल को किस आधार पर अवैध माना गया और उसे हटाने की प्रक्रिया क्यों अपनाई गई। उन्होंने इस पूरे मामले में Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991 का भी उल्लेख किया। चंद्र शेखर आजाद ने दावा किया कि कानून धार्मिक स्थलों की स्थिति को लेकर विशेष संरक्षण देता है और इस मामले में भी इसके प्रावधानों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। हालांकि इस कानून की मौजूदा विवाद पर वास्तविक कानूनी प्रयोज्यता और उसके दायरे का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होगा।

मस्जिद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को लेकर चंद्रशेखर आजाद ने प्रदेश सरकार और प्रशासन पर तीखा राजनीतिक हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में प्रशासन को निष्पक्ष और संवेदनशील तरीके से कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन सहारनपुर में इसके विपरीत जल्दबाजी में कार्रवाई की गई। भारत जैसे विविधता वाले देश में धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों को बेहद सावधानी से संभालने की जरूरत है। यदि किसी समुदाय को यह महसूस होने लगे कि उसके धार्मिक स्थल को राजनीतिक या सांप्रदायिक आधार पर निशाना बनाया जा रहा है तो इसका असर समाज के आपसी भाईचारे पर पड़ सकता है।

चंद्रशेखर आजाद ने चेतावनी दी कि सरकार और प्रशासन की ऐसी कथित सांप्रदायिक कार्रवाइयां देश की एकता और सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह हर समुदाय के साथ समान व्यवहार करे। चंद्रशेखर आजाद ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी इस मामले में चुप नहीं बैठेगी। उन्होंने कहा कि आजाद समाज पार्टी संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करती है और इस मामले में भी कानूनी रास्ते का सहारा लिया जाएगा।

उन्होंने कहा कि यदि प्रशासनिक कार्रवाई में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। पार्टी पीड़ित पक्ष की आवाज को उठाएगी और जरूरत पड़ने पर न्यायालय समेत सभी संवैधानिक मंचों पर इस मुद्दे को लेकर जाएगी। सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद पर हुई कार्रवाई के बाद अब विवाद केवल ध्वस्तीकरण तक सीमित नहीं रह गया है। एक तरफ प्रशासन की ओर से न्यायिक आदेश और अतिक्रमण संबंधी प्रक्रिया का हवाला दिया जा रहा है, वहीं चंद्रशेखर आजाद ने आदेश और वास्तविक कार्रवाई के बीच अंतर का सवाल उठाया है।
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