प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मजदूरों के आंदोलन से जुड़े एक मामले में छात्रा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत हिरासत को रद्द कर दिया। कोर्ट ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि रासुका जैसी असाधारण कार्रवाई का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को जमानत मिलने के बावजूद जेल में बनाए रखने के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोप, अनुमान, पूर्वाग्रह या अटकलों के आधार पर नागरिक की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने मामले में दो सितंबर को फैसला सुनाया था। आदेश की प्रति सोमवार को हाईकोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई गई। कोर्ट ने कहा कि हिरासत के आधार केवल जिलाधिकारी की राय पर आधारित नहीं हो सकते। उस राय के समर्थन में ठोस और विश्वसनीय सामग्री होना जरूरी है। इसके अभाव में हिरासत का आदेश मनमाना माना जाएगा और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
अदालत ने कहा कि आकृति चौधरी ने मजदूरों के अधिकारों के समर्थन में लोगों से एकत्र होने और शांतिपूर्ण आंदोलन में शामिल होने की अपील की थी। रिकॉर्ड में ऐसा कोई संदेश या वीडियो नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि उन्होंने हिंसा, आगजनी या सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए लोगों को उकसाया था।
पीठ ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान यदि कुछ शरारती तत्व हिंसा करते हैं तो इसके लिए पूरे आंदोलन को हिंसक नहीं माना जा सकता। लोकतांत्रिक समाज में लोगों को असहमति जताने और अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाने का अधिकार है। कोर्ट ने बड़े जमावड़ों के दौरान कानून-व्यवस्था संभालने के लिए बेहतर पुलिस व्यवस्था और घटनाओं की वीडियोग्राफी पर भी जोर दिया।
हाईकोर्ट ने गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। अदालत के अनुसार पुलिस रिपोर्ट महज आरोपों पर आधारित थी और उसके समर्थन में पर्याप्त विश्वसनीय सामग्री नहीं थी। इसके बावजूद जिलाधिकारी ने रिकॉर्ड की गहराई से जांच किए बिना रासुका जैसी कठोर कार्रवाई कर दी।
अदालत ने कहा कि अधिकारियों के पास व्यापक शक्तियां हैं, लेकिन शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है। अधिकारियों की निष्ठा संविधान और जनता के प्रति होनी चाहिए। मौलिक अधिकारों को उचित प्रक्रिया के बिना प्रभावित करने पर अदालत सख्त रुख अपनाएगी।
हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी की रासुका के तहत हिरासत और हिरासत के आधार निरस्त करते हुए उन्हें तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हों। साथ ही अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के लिए पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। यह राशि जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूलने और उनके सेवा अभिलेख में अदालत की नाराजगी दर्ज करने का भी निर्देश दिया गया।

